मई महीने में माइट पर नियंत्रण के लिए 200 लीटर पानी में डेढ़ से दो लीटर समर ऑयल

मई महीने में माइट पर नियंत्रण के लिए 200 लीटर पानी में डेढ़ से दो लीटर समर ऑयल




रस्टिंग की समस्या से परेशान बागवानों को पैटल फॉल के दौरान 200 लीटर पानी में 250 ग्राम बोरिक एसिड का छिडक़ाल करना जरूरी है। इससे रस्टिंग पर काबू पाया जा सकता है। फ्रूट सैटिंग पर सबसे पहली स्प्रे कैल्शियम नाइट्रट की करें। कैल्शियम नाइट्रेट फ्रूट की सैल डिविजन में मदद करता है। यहां ध्यान रखा जाए कि इसके साथ बोरोन की स्प्रे कतई न करें। यहां प्रसंगवश यह भी जिक्र जरूरी है कि किसी भी खाद के साथ मिलाकर बोरोन की स्प्रे न करें। इससे फसल को नुकसान हो सकता है। कारण यह है कि केमिकल फर्टीलाइजर के साथ बोरोन की कंपेटिबिलिटी नहीं है। कैल्शियम नाइट्रेट की स्प्रे 45 दिन के भीतर फिर दोहराएं। इससे फ्रूट की सैल डिविजन, फ्रूट लोंगेशन व साइज के बढऩे में काफी मदद मिलती है।
फ्रूट सैटिंग के बाद कैल्शियम नाइट्रेट के साथ सौ ग्राम मैगनीशियम मिलाने से प्रकाश संश्लेषण अच्छा होता है। क्योंकि मैगनीशियम पत्तियों में क्लोरोफिल को बढ़ाता है। बागीचे में पाउड्रीमिलड्री की परेशानी को दूर करने के लिए माइक्रोबुटानिल की स्प्रे की जानी चाहिए। मई महीने में माइट पर नियंत्रण के लिए 200 लीटर पानी में डेढ़ से दो लीटर समर ऑयल की स्प्रे जरूर करें। इससे माइट का खतरा टल जाता है। इस स्प्रे से प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया तेज होती है।
यूरिया की जानकारी जरूरी

यूरिया की जानकारी जरूरी



बागीचों में मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी को पूरा करने के लिए विशेषज्ञों ने यूरिया के इस्तेमाल का सुझाव दिया है। फल देने वाले पौधे में एक किलो यूरिया डाला जा सकता है। मार्च माह में इसका प्रयोग किया जा सकता है। एक किलो यूरिया का प्रयोग बागीचे की स्थिति के अनुसार एक बार में ही या फिर किश्तों में भी किया जा सकता है। इसके साथ एक किलो चूने का प्रयोग भी करना चाहिए। यूरिया में 46 फीसदी नाइट्रोजन होता है। यूरिया मिट्टी की नेचर को एसिडिक बनाता था, इस कारण बागवानों ने इसका प्रयोग बंद किया था, परंतु वैज्ञानिक यह सुझाते हैं कि चूने के प्रयोग से एसिडिक नेचर खत्म होती है और पौधे को नाइट्रोजन का पूरा पोषण मिलता है।
यदि मिट्टी परीक्षण में भूमि का एसिडिक 5 से 6 मानक का है तो यूरिया के साथ चूना लगाना बेहद जरूरी है। अगर पीएच 6.5 से लेकर 7 से अधिक है तो यूरिया के साथ चूने के प्रयोग की जरूरत नहीं है। यूरिया दाम में सस्ता है। इसे बागवान बेहिचक प्रयोग कर सकते हैं। एक किलो यूरिया के जरिए एक पौधे की नाइट्रोजन की 700 ग्राम की मात्रा पूरी हो जाती है।
पोषक तत्वों/खादों को डालने का कार्य

पोषक तत्वों/खादों को डालने का कार्य

मार्च महीने में फूल आने से दो या तीन सप्ताह पहले नाइट्रोजन की आधी मात्रा पौधों के तौलिए में डालें। इसी तरह अप्रैल माह या फ्रूट सेट होने के बाद बची हुई नाइट्रोजन की आधी मात्रा भी डाल दें। यदि किसी कारणवश नाइट्रोजन (कैन खाद) भूमि में न डाल सकें तो 200 लीटर पानी में एक किलोग्राम घोल कर छिडक़ाव करें। बोरोन की कमी को दूर करने के लिए 200 ग्राम बोरीक एसिड 200 लीटर पानी में घोल कर 15 दिन में दो छिडक़ाव जून माह में करें। इसी तरह मैग्नीज की कमी पर मैग्नीज सल्फेट 800 ग्राम 200 लीटर पानी में घोल कर 15 दिन के भीतर दो छिडक़ाव करें। कॉपर (तांबा) की कमी को दूर करने के लिए कॉपर सल्फेट 600 ग्राम 200 लीटर पानी में घोल कर 15 दिन के अंदर जून-जुलाई में दो छिडक़ाव करें। कैल्शियम की कमी दूर करने के लिए एक किलोग्राम कैल्शियम क्लोराईड 200 लीटर पानी में घोल कर तुड़ाई से 45 दिन और 30 दिन पहले दो छिडक़ाव करें। यह छिडक़ाव फल भंडारण के लिए आवश्यक है। यहां इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि जिंक सल्फेट, कॉपर सल्फेट और मैग्नीज सल्फेट के साथ आधी मात्रा में अनबुझा चूना अवश्य मिलाएं नहीं तो पत्ते झुलस सकते है और फल पर भी व्याधियां आ सकती हैं।
अब पत्तों पर पैनी नजर रखने से होगा माईट का बचाव

अब पत्तों पर पैनी नजर रखने से होगा माईट का बचाव

सेब का माईट मकड़ा है जिसकी दो प्रजातियां युरोपियन रैड माईट तथा टू-स्पॉटिड माईट माईट सेब की फसल को नुक्सान पहुचातें हैं। यूरोपियन रैड माईट लाल रंग और छोटा होता है है और लैंस की सहायता से सुगमता से देखा जा सकता है। वयस्क मादा की लम्बाई 0.4 मि.मी. लम्बी होती है, जिसकी पीठ उभर हुई तथा उस पर श्वेत गोल चिन्ह होते है सर्दियों में दिए जाने वाले अण्डे गहरे लाल रंग के तथा गर्मियों में अण्डों का रंग हल्का लाल होता है। रैड माईट के लारवा अपने सुईनुमा मुंह से पत्तियों में कई बार छेद करते हैं तथा पौधे का क्लोरोफिल चाट जाते हैं। माईट बागीच में फसल को बर्बाद करके दूसरी साल होने वालीफल को भी नुक्सान पहुचातें हैं। माइट को लेकर बागवान कुछ लापरवाह रहते हैं ऐसा नहीं होना चाहिए। माइट का स्प्रे पत्तों की सही जांच के बाद जून के प्रथम सप्ताह की जानी चाहिए जबकि बागवान तब स्प्रे करते है जब माइट पत्तों को नुक्सान करके फसल का नुक्सान कर चुका होता है ।
माईट को कैसे नियंत्रित करें
रैड माईट का नियन्त्रण का सबसे कारगर तरीका हॉर्टिक्ल्चरल मिनरल ऑयलकी स्प्रे है। बागीच में माईट की संख्या दो से तीन हो तो दो लीटर ऑयल 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें । ,पर उसके लिए पत्तों कर सही जांच करना आवश्यक है । ऑयल में किसी भी तरह के कीटनाशक को नहीं मिलाया जाना चाहिए। दूसरा उपाय अनुकूल मौसम में माईटनाशक रसायनों में सीपरोमैसीफीन 22.7 फीसदी एससी, 60 एमएल 200 लीटर पानी में शुरू में स्प्रे करने से होता है। यह दवाई शुरू में करे बागीच में माईट की संख्या अधिक होने पर यह कारगार नहीं है,ऐस में फन्जाक्वीन 10 ईसी, 50 एमएल,हैकसीथाईजोक्स, 200 एमएल और प्रापाजाइट, 200 एमएल का प्रयोग 200 लीटर पानी में स्प्रे कर माईट की रोकथाम कर सकतें है। बागवान यह ध्यान रखें की सामान्य कीटनाशकों का प्रयोग माईट नियन्त्रण में कारगर नहीं है।
नाशपाती, जो नज़र आती है सेब

नाशपाती, जो नज़र आती है सेब

सेब जैसी दिखने वाली पीसफुल रोजी क्लाउड नाशपाती

यह है “पीसफुल रोजी क्लाउड” नाशपाती, जो देखने में बिलकुल सेब लगती है पर स्वाद में नाशपाती है. 
नाशपाती की यह किस्म चीन के प्रोफ़ेसर झांग शाओलिन ने खोजी है. प्रो. शाओलिन चीन के नानजिंग कृषि विश्वविद्यालय में पढ़ाते मैं और इसी यूनिवर्सिटी पियर रिसर्च सेंटर में फ्रूट ब्रीडिंग पर  अनुसंधान करते हैं और नाशपातियों पर अपनी खोजों के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं. 

इस नाशपाती के फल केवल देखने में ही आकर्षक नहीं है परन्तु खाने में भी बहुत स्वादिष्ट है. इनका स्वाद हल्की खटास लिए मीठा है. इसका गूदा नरम और रसदार है. पीसफुल रोजी क्लाउड नाशपाती के फल न केवल बाहर से, बल्कि अन्दर से भी सेब जैसे दिखाते हैं. प्रो. शाओलिन को पूरी उम्मीद है कि नाशपाती की यह नयी किस्म लोगों को पसंद आयेगी और भविष्य में बहुत लोक प्रिय होगी.

पीसफुल रोजी क्लाउड नाशपाती के फल प्रो शाओलिन ने चीन के उत्तर पश्चिमी भाग में देखे थे. उन्होंने इस किस्म के पेड़ वहां से लाकर अपने अनुसंधान केंद्र में कई वर्षों तक टेस्ट किये और फिर तब इनको बागबानों को बांटना शुरू किया.
हिमाचल में 50 साल पहले हुए रिश्वत और भ्रष्टाचार के दो किस्से

हिमाचल में 50 साल पहले हुए रिश्वत और भ्रष्टाचार के दो किस्से

सन १९६२ में मैं फ्रूट रिसर्च स्टेशन धौलाकुंआं में रिसर्च असिस्टेंट था. मेरी उम्र उस समय २३ साल की थी. यह मेरे कैरियर की पहली नौकरी थी. वहां दफ्तर के ऑडिट के दौरान पता चला कि स्टेशन के एक क्लर्क नरदेव सिंह राणा ने लगभग 6 या 7000 रुपये का गबन कर लिया था. यह काम नरदेव सिंह ने तीन साल में किया था. नरदेव बिलों को अफसर से पास करवा कर बाद में बिल की राशि में 1 का अंक लगा देता और इस तरह 600 के बिल को 1600 का बना देता. कैशबुक में 600 दिखाता और 1000 रुपये खुद खा जाता. वो बहुत सस्ता ज़माना था. डेली पेड मजदूर को एक रुपया सत्तासी पैसे मिलते थे. इसलिए बहुत से कंटिनजेंट बिल हज़ार रुपये नीचे ही होते थे. 

इस घपले का पता तब चला जब नरदेव वहां से हैड क्लर्क प्रोमोट होकर मंडी चला गया. नरदेव वैसे बहुत ही मिलनसार और सबसे दोस्ती रखने वाला और वक्त पर सबके काम आने वाला शख्श था. धौलाकुआं में कोइ यह सोच भी नहीं सकता था कि यह आदमी कभी ऐसा काम करेगा. उसका रहन सहन भी बहुत सादा था.  

जैसे ही घपले का पता चला कृषि विभाग की ओर से मामला पुलिस को रिपोर्ट कर दिया गया. नरदेव को गिरफ्तार कर लिया गया. उसे हथकड़ी में पूछताछ के लिए मंडी से धौलाकुआं लाया गया. बाद में उसपर नाहन की अदालत में सरकारी पैसे के गबन का मुकद्दमा चला. कुछ टैक्नीकल कानूनी कारणों से उस पर सात केस चले. केसों का फैसला दो साल के अन्दर ही हो गया. नरदेव को विभिन्न केसों में 14 से 18 महीनों की जेल हुई. क्योंकि सभी फैसलों की सज़ाएँ एक साथ शुरू हुई, इस लिए नरदेव को केवल 18 महीने ही जेल में बिताने पड़े. 

दूसरा किस्सा 1969 का है. तब में कांगड़ा जिला के बागवानी विकास अधिकारी के रूप में धर्मशाला में तैनात था। एक दिन जब मैं कांगड़ा शहर में किसी काम के सिलसिले में आया हुआ था, तो मुझे कांगड़ा के एस डी एम, एस के आलोक का सन्देश मिला कि मैं कुछ उनके निवास पर आकर उनसे मिलूं. मेरे वहां पहुँचने पर उनहोंने मुझे बताया कि वे एक छापा मारने जा रहे हैं और मुझे उसमें बतौर शैडो विटनैस रखना चाहते हैं. श्री आलोक एक युवा आई ए एस अधिकारी थे और शायद यह उनके कैरियर की पहली पोस्टिंग थी. उनके घर पर, डी एस पी कांगड़ा, पी एस कुमार भी बैठे थे. श्री कुमार भी युवा आई पी एस अधिकारी थे और शायद उनकी भी यह पहली पोस्टिंग थी. उन दिनों कांगड़ा में इंडो जर्मन एग्रीकल्चर प्रोजेक्ट चल रहा था जिसके कारण हम सब का आपस में मिलना जुलना होता रहता था. हम तीनों हम उम्र भी थे और शायद इसीलिये आलोक ने अपनी इस छापामार टीम में हमको शामिल किया था.

       आलोक ने बताया कि तहसील का एक क्लर्क रिश्वत मांग रहा है और उसको रंगे हाथों पकड़ना है. मेरे लिए यह बहुत ही अनअपेक्षित काम था और मैं इसके लिए मानसिक रूप से कतई तैयार नहीं था. इसलिए पहले तो मैं घबराया पर बाद में उन दोनों के समझाने पर तैयार हो गया.

       आलोक ने छापे संबंधी कानूनी कागज़ात तैयार किये और फिर दस दस रूपये के दो नोट अपने हस्ताक्षर करके शिकायत कर्ता को दिए. उसे बताया कि ये नोट वह उस क्लर्क को देदे और हमें इशारा कर दे. 

       योजनानुसार हम तहसील जाकर बाहर बरामदे में खड़े हो गए. शिकायत कर्ता ने अन्दर जा कर क्लर्क से बात की और वो बीस रुपये के नोट उसे दे दिए. फिर उसने बाहर निकल कर हम लोगों को इशारा किया कि काम हो गया.

       इसके बाद एकदम आलोक हम दोनों के साथ क्लर्क की सीट गए और क्लर्क से पूछा कि क्या उसने पैसे लिए. क्लर्क ने इनकार किया. तो आलोक ने क्लर्क की जेब की तलाशी ली और वो बीस रुपये के नोट बरामद कर लिए. क्लर्क को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया. सब कुछ क्षणों में हो गया. मैंने तब आलोक से पूछा कि अब क्या होगा. उसपर आलोक ने कहा अब आगे का काम ठाकुर चेत राम करेंगे. ठाकुर चेत राम उस समय धर्मशाला में सैशन जज थे. शायद इस किस्म के मुकद्दमे उस वक्त सैशन जज के पास जाते थे.

       उसके बाद साल भर केस चला. ठाकुर चेत राम ने क्लर्क को दो साल की जेल की सजा दे दी. सुना था कि उस क्लर्क ने सैशन जज के फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील भी की थी जो खारिज हो गयी थी और उस क्लर्क को बीस रुपये की रिश्वत के लिए दो साल कड़ी जेल भुगतनी ही पडी थी.

       आज के भारत में जहां अब करोडो अरबों के घपले और रिश्वत काण्ड हो रहे हैं क्या कोइ विश्वास करेगा कि कहीं 6-7 हज़ार के घपले या बीस रुपये की रिश्वत के बदले भी जेल जाना पड़ सकता है और वो भी अपराध करने के दो साल के अन्दर. 

       काश देश में आज भी ऐसा हो पाता.
*केंचुओं के जीवनचक्र से संबंधित जानकारियाँ*

*केंचुओं के जीवनचक्र से संबंधित जानकारियाँ*



*1.* केंचुए द्विलिंगी (Bi-sexual or hermaphodite) होते हैं अर्थात एक ही शरीर में नर (Male) तथा मादा (Female) जननांग (Reproductive Organs) पाये जाते हैं।
*2.* द्विलिंगी होने के बावजूद केंचुओं में निषेचन (Fertilization) दो केंचुओं के मिलन से ही सम्भव हो पाता है क्योंकि इनके शरीर में नर तथा मादा जननांग दूर-दूर स्थित होते हैं और नर शुक्राणु (Sperms) व मादा शुक्राणुओं (Ovums) के परिपक्व होने का समय भी अलग-अलग होता है। सम्भोग प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद केंचुए कोकून बनाते हैं। कोकून का निर्माण लगभग 6 घण्टों में पूर्ण हो जाता है।
*3.* केंचुए लगभग 30 से 45 दिन में वयस्क (Adult) हो जाते हैं और प्रजनन करने लगते हैं।
*4.* एक केंचुआ 17 से 25 कोकून बनाता है और एक कोकून से औसतन 3 केंचुओं का जन्म होता है।
*5.* केंचुओं में कोकून बनाने की क्षमता अधिकांशतः 6 माह तक ही होती है। इसके बाद इनमें कोकून बनाने की क्षमता घट जाती है।
*6.* केंचुओं में देखने तथा सुनने के लिए कोई भी अंग नहीं होते किन्तु ये ध्वनि एवं प्रकाश के प्रति संवेदनशील होते हैं और इनका शीघ्रता से एहसास कर लेते हैं।
*7.* शरीर पर श्लैष्मा की अत्यन्त पतली व लचीली परत मौजूद होती है जो इनके शरीर के लिए सुरक्षा कवच का कार्य करती है।
*8.* शरीर के दोनों सिरे नुकीले होते हैं जो भूमि में सुरंग बनाने में सहायक होते हैं।
*9.* केंचुओं में शरीर के दोनों सिरों (आगे तथा पीछे) की ओर चलने (Locomotion) की क्षमता होती है।
*10.* मिट्टी या कचरे में रहकर दिन में औसतन 20 बार ऊपर से नीचे एवं नीचे से ऊपर आते हैं।
*11.* केंचुओं में मैथुन प्रक्रिया लगभग एक घण्टे तक चलती हैं।
*12.* केंचुआ प्रतिदिन अपने वजन का लगभग 5 गुना कचरा खाता है। लगभग एक किलो केंचुए (1000 संख्या) 4 से 5 किग्रा0 कचरा प्रतिदिन खा जाते हैं।
*13.* रहन-सहन के समय संख्या अधिक हो जाने एवं जगह की कमी होने पर इनमें प्रजनन दर घट जाती है। इस विशेषता के कारण केंचुआ खाद निर्माण (Vermi-composting) के दौरान अतिरिक्त केंचुओं को दूसरी जगह स्थानान्तरित (Shift) कर देना अत्यन्त आवश्यक है।
*14.* केंचुए सूखी मिट्टी या सूखे व ताजे कचरे को खाना पसन्द नहीं करते अतः केंचुआ खाद निर्माण के दौरान कचरे में नमीं की मात्रा 30 से 40 प्रतिशत और कचरे का अर्द्ध-सड़ा (Semi-decomposed) होना अत्यन्त आवश्यक है।
*15.* केंचुए के शरीर में 85 प्रतिशत पानी होता है तथा यह शरीर के द्वारा ही श्वसन एवं उत्सर्जन का पूरा कार्य करता है।
*16.* कार्बनिक पदार्थ खाने वाले केंचुओं का रंग मांसल होता है जबकि मिट्टी खाने वाले केंचुए रंगहीन होते हैं।
*17.* केंचुओं में वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration) होता है जिसके लिए इनके शरीर में कोई विशेष अंग नहीं होते। श्वसन क्रिया (गैसों का आदान प्रदान) देह भित्ति की पतली त्वचा से होती है।
*18.* एक केंचुए से एक वर्ष में अनुकूल परिस्थितियों में 5000 से 7000 तक केंचुए प्रजनित होते हैं।
*19.* केंचुए का भूरा रंग एक विशेष पिगमेंट पोरफाइरिन के कारण होता है।
*20.* शरीर की त्वचा सूखने पर केंचुआ घुटन महसूस करता है और श्वसन (गैसों का आदान-प्रदान) न होने से मर जाता है।
*21.* शरीर की ऊतकों में 50 से 75 प्रतिशत प्रोटीन, 6 से 10 प्रतिशत वसा, कैल्शियम, फास्फोरस व अन्य खनिज लवण पाये जाते हैं अतः इन्हें प्रोटीन एवं ऊर्जा का अच्छा स्रोत माना गया है।
*22.* केंचुओं को सुखा कर बनाये गये प्रतिग्राम चूर्ण (Powder) से 4100 कैलोरी ऊर्जा मिलती है।
फ्रूट सैटिंग के बाद कैल्शियम नाइट्रेट के साथ सौ ग्राम मैगनीशियम

फ्रूट सैटिंग के बाद कैल्शियम नाइट्रेट के साथ सौ ग्राम मैगनीशियम



फ्रूट सैटिंग के बाद कैल्शियम नाइट्रेट के साथ सौ ग्राम मैगनीशियम मिलाने से प्रकाश संश्लेषण अच्छा होता है। क्योंकि मैगनीशियम पत्तियों में क्लोरोफिल को बढ़ाता है। बागीचे में पाउड्रीमिलड्री की परेशानी को दूर करने के लिए माइक्रोबुटानिल की स्प्रे की जानी चाहिए। मई महीने में माइट पर नियंत्रण के लिए 200 लीटर पानी में डेढ़ से दो लीटर समर ऑयल की स्प्रे जरूर करें। इससे माइट का खतरा टल जाता है। इस स्प्रे से प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया तेज होती है।
सेब के पौधे में एक्टीवेटर का काम करता है जिंक

सेब के पौधे में एक्टीवेटर का काम करता है जिंक




सेब के पौधों के लिए जिंक एक अति आवश्यक सुक्ष्म पोषक तत्व है। साल में दो बार सेब के पौधों पर स्प्रे अति आवश्यक है। पहले चरण में पिंक बडड् OR AFTER SETTING पर, दूसरी सेब तुड़ान के बाद करनी चाहिए। बागवान सुप्तावस्था के समय जिंक सल्फेट और पिंक बडड्- AFTER SETTING के समय चिलैटिड जिंक रूप में की स्प्रे द्वारा कर पूरा कर सकते है। पौधों में जिंक की कमी को किसी अन्य रसायनों द्वारा भी पूरा किया जा सकता है। सेब के पौधों में बडड् ब्रेक से लेकर फ्रूट सेट का समय जिंक जैसे सुक्ष्म तत्व के हिसाब सें महत्वपूर्ण माना जाता है। जिंक की कमी फल देने वाले पौधों में फ्रूट सैटिंग कां प्रभावित कर सकती है। जिंक का प्रयोग सर्दीयों में मिटटी में डाल कर भी किया जा सकता है। लेकिन माना जाता है कि इस सुक्षम तत्व को पौधे में पहुचनें के लिए पौधे में पत्तियां होना जरूरी है। अगर ऐसा नहीं है तो पौधा इस सुक्ष्म तत्व को प्राप्त नहीं कर सकता है। पत्ते आने के बाद अगर स्प्रे की जाए तो वे ज्यादा फायदेमंद है
ये रही  2018  की  स्प्रे  सरणी सेब के बगीचों के लिए || Himachal Pradesh

ये रही 2018 की स्प्रे सरणी सेब के बगीचों के लिए || Himachal Pradesh

 ध्यान दीजिये इस लिंक पर क्लिक करने के बाद आप जो फाइल डाउनलोड करेंगे वो pdf फाइल है इसके लिए आपके पास pdf  reader होना जरूरी है | जो आप ;प्ले स्टोर से डाउनलोड केर सकते है |




इस लिंक पर क्लिक कीजिये
spray shedule 2018 hiachal apple
बागीचों में न करें कीटनाशक की स्प्रे

बागीचों में न करें कीटनाशक की स्प्रे



बागवान बागीचों में इस समय धड़ल्ले से कीटनाशकों की स्प्रे कर रहे हैं।
यह गलत है। इस समय कीटनाशकों की स्प्रे नहीं की जानी चाहिए। कारण यह है
कि फ्रूट सैटिंग में कीटनाशकों की स्प्रे का कोई रोल नहीं है। आज से पांच
या छह साल पहले जो कीटनाशकों की स्प्रे की जाती थी, वो फूलों में थ्रिप्स
की अधिक संख्या होने के कारण की जाती थी। वह स्प्रे थ्रिप्स को कंट्रोल
करने के लिए होती थी। पिछले कुछ सालों में वातावरण इन दिनों यानी मार्च
अप्रैल में सर्द ही चल रहा है। ऐसे में थ्रिप्स ऑटोमेटिकली कंट्रोल हो गए
हैं। इस समय जो बागवान कीटनाशकों की स्प्रे कर रहे हैं, उससे मित्र कीट नष्ट
हो रहे हैं। इससे माइट व सेंजो स्केल पनप रहा है।
कीट विज्ञानी डॉ. सुषमा भारद्वाज का कहना है कि इस समय
कीटनाशकों की स्प्रे जरूरी नहीं है। पिंक बड पर तो यूं भी कीटनाशकों की
स्प्रे नहीं करनी चाहिए। बागवानी विशेषज्ञ भी इस समय कीटनाशकों की स्प्रे
को रिकमंड नहीं करते हैं। यदि इस समय कीटनाशकों की स्प्रे की जाए तो उससे
मित्र कीट नष्ट होते हैं और माइट व सेंजो स्केल पनपता है।
पॉलीनेशन की जानकारी सही, तो सेब की सेटिंग बंपर

पॉलीनेशन की जानकारी सही, तो सेब की सेटिंग बंपर



परागण प्रक्रिया को मदद करने में यह क डाईप्टोरा, हाईमिनोप्टेरा, लेपीडोप्टेरा, कोलियोप्टेरा और थाईसेनाप्टोरा सहायक है। बागवानों में पॉलीनेशन के प्रति जानकारी होना सेब व चैरी अच्छी पैदावार के लिए जरूरी है। मधुमक्खियों और अन्य कीटों से किये जाने वाले पॉलीनेशन से बादाम और सेब के पैदावार में 20 से 25 और चैरी में 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की जा सकती है। कुल्लु घाटी में फल उत्पादन में देसी मधुमक्खी एपिस सिराना का महत्वपुर्ण योगदान देखा गया है, जबकि विदेशी मधुमक्खी एपिस मेलीफेरा परायह मधुमक्खी कम तापमान में भी पॉलीनेशन करने मेें सहायक है। पॉलीनेशन सही न होने से फलों का आकार छोटा और टेढ़ा-मेढ़ा होता है। तापमान 21 डिग्री सेल्सियस के आस पास हो तो मधुमक्खियों पॉलीनेशन प्रक्रिया बहुत अच्छी होती है।
बागीचों से हटांए अनचाह घास
बागीचों में मधुमक्खियां रखी जाएं तो फूलदार पौधे जैसे मूली और सरसों आदि नहीं होने चाहिए। ऐसा होने पर मक्ख्यिों इन फूलों पर चली जाएंगी, जिससे सेब में का परागण प्रक्रिया प्रभावित होगी ।
मधुमक्खियों स्थान बदलना होगा नुक्सानदायक
मधुमक्खियों के बक्से को एक दिन में एक से दूसरी जगह नहीं ले जाना चाहिए ऐसा करने से मधुमक्खियां पुराने स्थान आएगी और बक्सा न मिलने पर यह मर सकती है। इसलिए मधुमक्खियों बक्से को एक दिन में एक मिटर से अधिक दूरी पर नही ले जाना चाहिए ।
बागीच में करें पानी की व्यवस्था
बागीचे में जब बागवान मधुमक्खियों के बक्से रख लें, उसके बाद कीटनाशकों का छिडक़ाव न करें। मधुमक्खियों को अपने शरीर का तापमान बनाने और अंडशावकों को पैदा करने के लिए पानी की जरूरत होती है। ऐसे में मधुमक्खियां पानी की तलाश में भटकती है। बागवानों को चाहिए कि वे बक्सों के साथ ही साफ पानी रखें ।
मधुमक्खियों को बागीच में रखने के कुछ सुझाव
पांच बीघे में मधुमक्खियों का तीन बॉक्स लगाना जरूरी है। बक्से कम हवा और अधिक धुप वाले स्थान पर होने चाहिए। मधुमक्खियों की संख्या को मापने के लिए दो से तीन मक्खियां फूल के झुुुुंड पर मंडऱाती नजर आए तो समझ लेना चाहिए बक्से में पर्याप्त मौनवंश है। कम से कम 10 पेड़ों पर एक दिन में जांच करें। पुराने बागीचे में अच्छे पॉलीनेशन के लिए कम से कम 20 मधुमक्खियां प्रति पेड़ प्रति मिनट की दर से मंडऱानी चाहिएं। सेटिंग के दौरान कम से कम 25 फलों को चुनें और इन्हें काट कर इनके बीज गिने। यदि 5-6 से कम बीज हों तो पॉलीनेशन सही नहीं हुआ है।
को-रॉट के लिए समय पर करे स्प्रे

को-रॉट के लिए समय पर करे स्प्रे

.

हिमाचल में इसकी पैदावार 6 से 9 टन प्रति हैक्टेयर है, विश्व के अग्रणी सेब उत्पादक देश न्यूलीलैंड, चीन, जापान, अमेरीका, और आस्ट्रेलिया आदि में यह 30-40 टन प्रति हैक्टेयर के करीब है। कम पैदावार के पीछे विभिन्न प्रकार के रोग और प्रूनिंग की पुरानी तकनीक भी कारण रहा है। वहीं कोर रॉट रोग भी सेब की पक्की फसल के आंकड़े को नीचे गिराने का काम करता है। ऐसा रोग है जून से लेकर फल तुड़ान के बीच भारी ड्रापिंग होती है। रोग के प्रभाव से हानि का यह प्रतिशत 5 से 25 के बीच रहता है, इससे बागवानों को भारी आर्थिक क्षति होती है। कोर रॉट से प्रभावित फल स्टोर के समय सड़ जाते हैं। कोर रॉट के फफंूद हमेशा सेब के रोगग्रस्त पत्तों, फलों और टहनियों पर जीवित रहते है। फफंूद मार्च-अप्रैल माह मे फूल से पंखुडीपात की अवस्था में विभिन्न भागों पर पनपकर इन्फेकशन पैदा करता है। वर्ष समय अधिक हो सकती क्योंकि फ्लाविरंग पर बारिश और अधिक नमी होने से कोर रॉट फैलने की संभावना ज्यादा रही है। इसलिए बागवान इस साल इस बीमारी को लेकर ज्यादा सजक रहें। जहां बागवान को-रॉट या दाने के बीज सडऩे की समस्या से जूझ रहे हों, वहां पिंक और फूल झडऩे के बाद 200 लीटर पानी में 600 ग्राम डायथिन प्लस, 100 ग्राम बैवेस्टियन या 35 मिलीलीटर स्कोर के मिश्रण की स्प्रे कर इस परेशानी को दूर कर सकते हैं। के समय अगर मौसम नमी वाले रहे तो सेब में को-रॉट की संभावना अधिक रहता है। जो सेब के बागीच जंगल के साथ लगते है वहीं नीम के कारण यह समस्या अधिक हो सकती है। फ्लावरिंग के समय अधिक बारिश और नमी कर वजह से दाने का बीज के फ्रंगस की चपेट में आने फल समय से पहले मैच्यूर होने पहले गिर जाता है। दाने गिरने का कारण को-रॉट है जिस की वजह से बीज सड़ जाता है और टहनी पर लगा फल गिर जाता है। ध्यान रहे लोअर बेल्ट जैसी ही फल में क्लर की स्प्रे करेंगे । वैसे ही को-रॉट चपेट में आए दाने गिरने शुरू हो जाएंगे। पिंक बड स्टेज पर 200 लीटर पानी में 600 ग्राम डायथिन प्लस, 100 ग्राम बैवेस्टियन या 35 मिलीलीटर स्कोर के मिश्रण की स्प्रे कर इस परेशानी को दूर कर सकते हैं। बागवान 30 फीसदी फ्लावरिंग में 50 एम एल स्कोर 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे कर सकतें है। इसें बाद फ्रूट सैटिँग के बाद भी यही स्प्रे कर सेते हैं।



पराग कणों को ब्रश से लगाना थोड़ा कठिन कार्य है। पराग कोषों यानी एन्थर्स को एकत्र कर कपड़े में लपेट कर उन्हें ओवन में 20 डिग्री सेल्सियस तापमान में रखा जाता है। एक दिन बाद ही उनमें परागकण निकल जाते हैं। इन्हें ब्रश की सहायता से हर चौथे बीमें में लगा देने से फसल में बढ़ोतरी होती है। यह देखा गया है कि यदि फूल आने के समय मौसम अधिक ठंडा और गर्म हो तो परागकण किस्मों में पर्याप्त मात्रा में फूल लगने के बावजूद फसल बहुत कम लगती है। सफल परागकण के लिए फूल खिलने के दौरान उचित तापमान का होना जरूरी है। अक्सर यह देखा गया है कि कम तापमान में परागण और निशेचन क्रिया पूरा होने में अधिक समय लेती हैं। उदाहरण के तौर पर 8 डिग्री सेल्सियस पर इस क्रिया को पूरा करने में 216 घंटे लगते हैं, जबकि 15 डिग्री सेल्सियस तापमान पर यह किया केवल 48 घंटों में हो जाती हैं। फूल लगने से पहले इसका मजबूत होना जरूरी है ताकि वह तापमान के उतार-चढ़ाव को सहन करने की क्षमता रख सके। इसके लिए पौधे की हरी कली अवस्था पर यूरिया 0.5, बोरीक एसिड 0.1 प्रतिशत ओर अन्य बलवर्धक हार्मोन एवं पोषक तत्वों का छिडक़ाव करना चाहिए। परागनलिका की बढ़ोतरी में बोरीक एसिड अहम भूमिका निभाता है।